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Rishi Panchami: कब है ऋषि पंचमी, जानें पूजा विधि, महत्व और इस दिन से जुड़ी खास मान्यताएं

हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी का पर्व श्रद्धा, आत्मशुद्धि और प्रकृति के प्रति सम्मान से जुड़ा हुआ माना जाता है। यह पर्व गणेश चतुर्थी के अगले दिन यानी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन सप्तऋषियों का स्मरण और पूजन करने से जाने-अनजाने में हुए दोषों से मुक्ति की कामना की जाती है। खासतौर पर महिलाएं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करती हैं, हालांकि इसका धार्मिक महत्व सभी श्रद्धालुओं के लिए माना जाता है।

Rishi Panchami 2026 में कब मनाई जाएगी?

साल 2026 में ऋषि पंचमी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार इस दिन सप्तऋषियों के साथ देवी अरुंधती का पूजन करने की परंपरा है। अलग-अलग स्थानों पर पंचांग और सूर्योदय के आधार पर पूजा के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार शुभ मुहूर्त देखना बेहतर माना जाता है।

क्यों मनाई जाती है ऋषि पंचमी?

ऋषि पंचमी के पीछे केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि जीवन को संयम और कृतज्ञता से जोड़ने का संदेश भी छिपा है। प्राचीन परंपरा में ऋषियों को ज्ञान, तप और सदाचार का प्रतीक माना गया है। इस दिन उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए श्रद्धालु अपने जीवन में अच्छे विचारों और सद्कर्मों को अपनाने का संकल्प लेते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार महिलाओं द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत रखने का एक उद्देश्य रजस्वला अवस्था में अनजाने में हुए धार्मिक दोषों के प्रायश्चित से जुड़ा है। हालांकि आधुनिक दृष्टि से इन मान्यताओं को सांस्कृतिक और पारंपरिक संदर्भ में समझना जरूरी है।

ऋषि पंचमी पूजा विधि

ऋषि पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनने की परंपरा है। इसके बाद पूजा स्थल को साफ करके सप्तऋषियों का ध्यान किया जाता है। कई घरों में मिट्टी या प्राकृतिक सामग्री से सप्तऋषियों का प्रतीक बनाकर पूजा की जाती है।

पूजा में जल, अक्षत, फूल, फल, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद सप्तऋषियों और देवी अरुंधती का स्मरण किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखते हैं और पूजा के बाद कथा सुनते या पढ़ते हैं।

ग्रामीण और पारंपरिक परिवारों में इस दिन प्राकृतिक और सात्विक भोजन का विशेष महत्व देखा जाता है। कई जगह विशेष प्रकार की सब्जियों, फलों और बिना अनाज के भोजन का सेवन करने की परंपरा भी है।

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