भारत में जब भी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों की नियुक्ति का सवाल उठता है, तो एक बहस फिर सामने आ जाती है—आखिर जजों को चुनने का अधिकार किसके पास होना चाहिए: न्यायपालिका के पास या सरकार के पास? राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी NJAC इसी सवाल से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है। अक्टूबर 2026 में पूर्व मद्रास हाईकोर्ट जज जस्टिस के. चंद्रू की टिप्पणियों ने इस बहस को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। उन्होंने मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाए और NJAC को दोबारा चर्चा के केंद्र में ला दिया।
NJAC क्या है और इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई?
NJAC का पूरा नाम National Judicial Appointments Commission है, जिसे हिंदी में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कहा जाता है। इसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को अधिक व्यापक और पारदर्शी बनाना था।
लंबे समय से भारत में कॉलेजियम सिस्टम के जरिए उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की जाती रही है। इस व्यवस्था में वरिष्ठ जजों का समूह नए जजों के नामों की सिफारिश करता है। इस प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि चयन के मानदंड और फैसलों के पीछे के कारण आम जनता के सामने कितनी स्पष्टता से आते हैं।
इसी पृष्ठभूमि में संसद ने 99वां संविधान संशोधन और NJAC अधिनियम, 2014 पारित किया। इसका मकसद जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका के साथ कार्यपालिका की भूमिका भी शामिल करना था।
NJAC को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द किया था?
NJAC के गठन में छह सदस्यों का प्रावधान था। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज, केंद्रीय कानून मंत्री और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होने थे। इन प्रतिष्ठित व्यक्तियों के चयन में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका प्रस्तावित थी।
लेकिन इस व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 99वें संविधान संशोधन और NJAC अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत की प्रमुख चिंता यह थी कि प्रस्तावित व्यवस्था न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकती है। इसके बाद कॉलेजियम सिस्टम फिर से लागू रहा।
अक्टूबर 2026 में फिर क्यों चर्चा में आया NJAC?
ताजा चर्चा की एक बड़ी वजह पूर्व मद्रास हाईकोर्ट जज जस्टिस के. चंद्रू की टिप्पणी है। अक्टूबर 2026 में उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि जजों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है और NJAC को समाप्त किए जाने के बाद भी कोई स्थायी वैकल्पिक व्यवस्था विकसित नहीं हुई है।
आम जनता के लिए यह बहस क्यों जरूरी है?
मान लीजिए किसी व्यक्ति का मामला कई वर्षों से अदालत में लंबित है। वह चाहता है कि उसे समय पर न्याय मिले और फैसला बिना किसी दबाव के हो। ऐसे में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया का महत्व अपने आप समझ में आता है।
अगर चयन प्रक्रिया पारदर्शी होगी, तो लोगों का संस्थाओं पर भरोसा बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यदि सरकार को नियुक्तियों में जरूरत से ज्यादा प्रभाव मिल जाए, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं पैदा हो सकती हैं। यही इस पूरी बहस का सबसे अहम पहलू है।
एक तरफ कॉलेजियम सिस्टम के समर्थक न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते हैं, तो दूसरी तरफ इसके आलोचक चयन प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही चाहते हैं। समाधान ऐसा होना चाहिए जो दोनों चिंताओं को गंभीरता से समझे।
क्या NJAC की वापसी संभव है?
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस बहस से कोई ठोस सुधार निकलता है या Collegium System ही आगे भी जारी रहता है। आखिरकार, लोकतंत्र में सबसे जरूरी बात यही है कि न्यायपालिका स्वतंत्र रहे और जनता का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत हो।
