India-US Trade Deal:भारत-अमेरिका ट्रेड डील: क्या चल रहा है — और क्यों बढ़ी उम्मीदें

पिछले कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील की बातचीत — यानी BTA (Bilateral Trade Agreement) — ने जोर पकड़ा है। दोनो देशों के वाणिज्यिक प्रतिनिधियों की बैठकों के बाद, अब ऐसा लग रहा है कि पहला चरण (first tranche) इस साल के अंत तक फाइनल हो सकता है।

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री Piyush Goyal और वाणिज्य सचिव Rajesh Agarwal ने स्वयं कहा है कि बातचीत “अच्छे माहौल में” चल रही है, और जब डील “फेयर, बैलेंस्ड और व्यावहारिक” होगी — तभी उस पर तय फैसला लिया जाएगा।

वार्ताओं के प्रमुख बिंदुओं में शामिल हैं — शुल्क (tariffs) में कटौती, विशेष रूप से “पारस्परिक टैरिफ” (reciprocal tariffs) का मसला, बाज़ार पहुँच (market access), और अमेरिका की मांगें: कृषि, डेयरी, खाद्य-संबंधित वस्तुओं सहित कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश।

क्या है विवाद — और डील क्यों विलम्बित

हालाँकि बातचीत तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन सहमति अभी नहीं बनी है — क्योंकि दोनों पक्षों की मांगों में अंतर है। भारत कई कृषि, डेयरी, और संवेदनशील वस्तुओं में टैरिफ और बाजार खोलने के पक्ष में नहीं है। इस कारण से, अमेरिका की मांगों को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।

भारत के निर्यातक, especially उद्योग और एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन — जैसे Federation of Indian Export Organisations (FIEO) — ने जोर देकर कहा है कि 25 % “सेकेंडरी टैरिफ” (secondary tariff) को हटाया जाए। क्योंकि अप्रैल के बाद से, उस टैरिफ के कारण भारत से अमेरिका जाने वाले सामानों की मांग प्रभावित हुई है।

भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ विवाद 2025 की बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से है — और डील के हक में सकारात्मक माहौल होने के बावजूद, यह सुनिश्चित करना कि किसानों, छोटे निर्माताओं और उद्योगों की हितों की रक्षा हो, बेहद अहम है।

अगर डील होती है — भारत के लिए क्या फायदे हो सकते हैं

  1. टैरिफ में कटौती: अगर पहले ट्रांच में पारस्परिक टैरिफ (reciprocal tariffs) को कम किया गया, तो भारत से अमेरिका जाने वाले एक्सपोर्ट — टेक्सटाइल, leather, जड़ी-बूटियाँ, इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटो पार्ट्स आदि — अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। इससे भारत-मूल्य निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी।

  2. निर्यात में बढ़ोतरी: अमेरिकी बाजार खुलने से भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ सकती है; इससे औद्योगिक उत्पादन, रोजगार और विदेशी मुद्रा अर्जन में मदद मिलेगी।

  3. आयात-निर्यात संतुलन में सुधार: डील से भारत-अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन सुधर सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक भरोसा और सहयोग बढ़ सकता है।

  4. औद्योगिक और निवेश वृद्धि: अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत को सप्लाई-हब बनाने की कोशिश तेजी से होगी; साथ ही भारत में निवेश और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की संभावनाएँ भी बनेंगी।

वास्तव में, भारत के नीति नियामक समीकरण (manufacturing competitiveness, global supply chains, Make in India आदि) को ध्यान में रखते हुए — यह डील एक बड़ा अवसर हो सकता है। इसकी वजह से भारत न सिर्फ उपभोक्ता-वस्तुओं में बल्कि मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग गुड्स में भी अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।

किन बातों पर अभी निगाहें — और क्या है ‘डील के बाद का परिदृश्य’

डील फाइनल हो जाने के बाद भी — भारत को संतुलन बनाना होगा: एक तरफ निर्यातकों और उद्योगों को राहत देना, दूसरी तरफ किसानों और संवेदनशील कृषि-सेक्टर की रक्षा। अगर समझौता केवल उद्योग-हितैषी हुआ, और कृषि/किसानों की अनदेखी हुई — तो देश के सामाजिक-आर्थिक ढांचे पर असर पड़ सकता है।

साथ ही, डील की सफलता के लिए — व्यापार नीतियों में स्थिरता (policy stability), निर्यातकों की तैयारी, और भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता-मानक (standards) तय करना ज़रूरी होगा। इसके बिना, सिर्फ टैरिफ कटौती ही पर्याप्त नहीं होगी।

अतः सरकार, उद्योग व व्यापारिक संगठनों, और नीति निर्माताओं को — डील की शर्तों, लाभों और चुनौतियों — तीनों का संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा।

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